Wednesday, May 16, 2007

मई - 2007

देखो, शब्द कहीं से लो, अरबी, फारसी, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी कहीं का हो, ख्याल रहे कि ख्यालात का तसब्बुर और ज़वान की रवानगी ........ भाषा की प्रवहमानता और विचारों का क्रम बना रहे।

—प्रेमचन्द
[उपेन्द्रनाथ अश्क को लिखे पत्र से साभार]

Wednesday, August 16, 2006

अक्टूबर - 2006

* "स्वाधीनता जब अपने सर्वोत्तम रूप में प्रकट होती है तब उसके साथ-साथ सर्वोच्च रूप में अनुशासन और विनम्रता भी रहती है।"
-महात्मा गाँधी

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* " प्रेमचन्द पुरुष में थोड़ी सी पशुता पाते हैं, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है। विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है। जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुँचेगा, वह भी स्त्री हो जाएगा। वात्सल्य, कोमलता, दया इन्हीं आधारों पर यह सृष्टि थमी हुई है और यह स्त्रियों के गुण हैं।"
-(आजकल, दिसम्बर 1993, पृ०-26, संजीव पाठक का लेख)

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* "ग्रामगीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं, केवल रस है ! छन्द नहीं केवल लय है !! लालित्य नहीं, केवल माधुर्य है !!! ग्रमीण मनुष्यों के, स्त्री पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति गान करती है, प्रकृति के वे ही गान ग्रामगीत हैं।"
(रामनरेश त्रिपाठी, कविता कौमुदी, भाग-5, प्रस्तावना- पृ० 1-2)

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* "जो बात असाधारण और निराले ढँग से शब्दों द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है ।"
-महावीर प्रसाद द्विवेदी

Sunday, May 01, 2005

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