Wednesday, May 16, 2007

मई - 2007

देखो, शब्द कहीं से लो, अरबी, फारसी, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी कहीं का हो, ख्याल रहे कि ख्यालात का तसब्बुर और ज़वान की रवानगी ........ भाषा की प्रवहमानता और विचारों का क्रम बना रहे।

—प्रेमचन्द
[उपेन्द्रनाथ अश्क को लिखे पत्र से साभार]



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